अरिया पुग्गल का धम्म (आर्य पुग्गलो की विशेषताऐं)

अरिया पुग्गल का धम्म (आर्य पुग्गलो की विशेषताऐं)

अरिया पुग्गल का धम्म (आर्य पुग्गलो की विशेषताऐं) Viewers(1)

रिया पुग्गल का धम्म (आर्य पुग्गलो की विशेषताऐं)

सोतापन्न

सक्कदागामि

अनागामि

अरहत्त

 

सोतापन्नमग्ग

अकुसल चित्त 12 में से 5 को नष्ट करता है (दिट्ठीगतासम्पयुत्तं चित्त 4 और विचिकिच्छा  चित्त 1)

 

पहाण अकुसल चित्त 5 – लोभदिट्ठीगता सम्पयुत्त चित्त 4,विचिकिच्छा सम्पयुत्त चित्त 1

  • सोमनस्ससहगतं दिट्ठिगता सम्पयुत्तं असंखारिकं कामावचरा अकुशल लोभमूल चित्तं।
  • सोमनस्ससहगतं दिट्ठिगता सम्पयुत्तं संखारिकं कामावचरा अकुशल लोभमूल चित्तं।
  • उपेक्खासहगतंदिट्ठिगतासम्पयुत्तंअसंखारिकंकामावचरा अकुशल लोभमूल चित्तं।
  • उपेक्खासहगतं दिट्ठिगता सम्पयुत्तं संखारिकं कामावचरा अकुशल लोभमूल चित्तं।
  • उपेक्खासहगतं विचिकिच्छा सम्पयुत्तं असंखारिकं कामावचरा अकुशल मोहमूल चित्तं।

पहाण अकुसल कम्मपथ 10 में से कुछ का पहाण करते - पाणातिपाता, अदिन्नादाना, कामेसुमिच्छाचारा, मुसावादा, मिच्छादिट्ठी।

पहाण अकुसल संगह 9 में से कुछ का पहाण करते - दिट्ठासवा (गलत विचारों का उत्पन्न), दिट्ठयोगा(गलत विचारों का बन्धन) , सीलबत्तपरामासा कायागन्था(संस्कारों और अनुष्ठानों के पालन की शारीरिक गाँठ),

इदं सच्चाभिनिवेस कायागन्था (यह हठधर्मी के विश्वास की शारीरिक गाँठ है कि केवल यही सत्य है), दिट्ठ उपादान (अकुलस विचारों में लिप्त रहना), सीलबत्त उपादान (रीति-रिवाजों और समारोहों से लिप्त रहना), अत्तवादुपादान(स्वयं के सिद्धान्त से लिप्त रहना), विचिकिच्छा नीवरणा(संदेह की बाधाएं), दिट्ठानुसय(मिथ्यादिष्ठी के प्रति अव्यक्त प्रवृति), विचिकिच्छानुसय(अव्यक्त और संदेह की प्रवृति), दिट्ठी संयोजना(मिथ्याधारणाओ की बेड़ियाँ), सीलबत्त परामास संयोजना (रीतिरिवाजों तथा समारोहों की बेड़ियाँ), विचिकिच्छा संयोजना (संदेह की बेड़ियाँ), इस्सा संयोजना(ईर्ष्या की बेड़ियाँ), मच्छरिया संयोजना(लोभ की बेड़ियाँ), दिट्ठी किलेसा(मिथ्यादिष्ठी का कलंक), विचिकिच्छा किलेसा (संदेह का कलंक)।

  • पहाण अकुसल चेतसिक 14 में से कुछ का पहाण करते - दिट्ठी चेतसिक, इस्सा चेतसिक, मच्छरिया चेतसिक, विचिकिच्छा चेतसिक।

सक्कदागामि मग्ग

कोलंकोला सोतापन्न, सत्तक्खतु सोतापन्न, एकाबीजी सोतापन्न।

(जिसने पहली बार निब्बान की ओर जाने वाली धारा में प्रवेश किया हो तथा जो अपाय में नहीं जायेगा)

यहाँ सोतापन्न के तीन स्तर है– जिनको निम्न प्रकार जानते हैं

वे सोतापन्न लोग जो स्वर्ग और पृथ्वी में अधिकतम सात बार पैदा होंगे। और वह सात जन्मों के अन्दर  ही अरहन्त अवस्था को प्राप्त होगें। (सत्तक्खतुपरम)

वो सोतापन्न लोग जो अरहन्त अवस्था प्राप्त करने से पहले 2 से 3 बार आदर्श परिवारों में जन्म लेते हैं। (कोलंकोला)

वो सोतापन्न लोग जिनका जन्म अरहन्त अवस्था प्राप्त करने से पहले एक बार होगा। (एकबीजी)

एक सोतापन्न व्यक्ति में बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति अटूट सद्धा होती है वह न तो पाँच सीलों को तोड़ता और न ही छह जघन्य अपराध (1.माता की हत्या, 2.पिता की हत्या,  3.अरहन्त की हत्या 4. आत्महत्या 5. संघभेद 6. बुद्ध को चोट पहुँचना) नहीं करता है। वह अपाय भूमि 4 में जन्म लेने से मुक्त हो जाता है। वह कभी भी आत्मज्ञान को प्राप्त कर सकता है।

  • सक्कदागामि
  • वो आर्यपुग्गल जो पृथ्वी लोक में एक बार मनुष्य के रूप में वापस आयेगें। इस जीवन में सक्कदागामि अवस्था प्राप्त करने के बाद, हो सकता हैं कि वह स्वर्ग भूमि में उत्पन्न हो और अरहन्त अवस्था प्राप्त करने के लिए मनुष्य भूमि में आये। यहाँ पर 5 प्रकार के सक्कदागामि है–
  1. वो आर्यपुग्गल जो सक्कदागामि अवस्था यहां (पृथ्वी पर) प्राप्त कर और स्वयं यहीं पर परिनिब्बान प्राप्त करते हैं।
  2. वो आर्यपुग्गल जो स्वर्ग में सक्कदागामि अवस्था  प्राप्त करके वहीं पर परिनिब्बान प्राप्त करते हैं।
  3. वो आर्यपुग्गल जो सक्कदागामि अवस्था पृथ्वी पर प्राप्त कर और स्वर्ग में परिनिब्बान प्राप्त करते है।
  4. वो आर्यपुग्गल जो सक्कदागामि अवस्था स्वर्ग में प्राप्त करते और परिनिब्बान मनुष्य लोक में प्राप्त करते है।
  5. वो आर्यपुग्गल जो सक्कदागामि अवस्था मनुष्य भूमि में प्राप्त करते और स्वर्ग भूमि में जन्म लेकर, और मनुष्य भूमि में  आने का इन्तजार करते और परिनिब्बान प्राप्त करते है।

 

अनागामि मग्ग

अनागामि  अकुसल चित्त 2 को नष्ट करता है– दोसमूल चित्त 2

दोमनस्ससहगतं पटिघासम्पयुत्तं असंखारिकं कामावचरा अकुशल दोसमूल चित्तं।

दोमनस्ससहगतं पटिघासम्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचरा अकुशल दोसमूल चित्तं।

  • पहाण अकुसल कम्मपथ 10 में से कुछ का पहाण करते – पिसुणवादा, फरूस्सवादा , ब्यापाद।
  • पहाण अकुसल संगह 9 में से कुछ का पहाण करते - कामागन्था, कामछन्द नीवरणा, ब्यापाद नीवरणा, कुक्कुच्च नीवरणा, कामरागानुसय, पटिघानुसय, कामरागा संयोजना, पटिघा संयोजना, दोस किलेसा।
  • पहाण अकुसल चेतसिक 14 में से कुछ का पहाण करते - दोस चेतसिक, कुक्कुच्च चेतसिक
  • वो लोग जो कामलोक में वापस नहीं आते। ऐसे लोग शुद्धनिवास (सद्धावास) में जन्म लेते हैं,जो उच्च ब्रह्म भूमियां है जहां अनागामि और अरहन्त अवस्था प्राप्त करने तक रहते है।
  • यहां 5 प्रकार के अनागामि के बारें में बताया गया है—
  1. ऐसे आर्य पुग्गल जो अपने शुद्धनिवास के पहले आधे जीवन काल के भीतर परिनिब्बान प्राप्त करते हैं। (अन्तरपरिनिब्बायी)
  2. ऐसे आर्य पुग्गल जो  शुद्धनिवास में अपने जीवन काल का आधे से ज्यादा जीवन जी चुंकने के बाद परिनिब्बान प्राप्त करते है। (उपहच्चपरिनिब्बायी)
  3. ऐसे आर्य पुग्गल जो कठिन परिश्रम के साथ परिनिब्बान प्राप्त करते हैं( ससंखार परिनिब्बायी)
  4. ऐसे आर्य पुग्गल जो बिना परिश्रम के परिनिब्बान प्राप्त करते है (असंखारपरिनिब्बायी)
  5. ऐसे आर्य पुग्गल जो एक ब्रह्म भूमि से निकलकर एक उच्चतर ब्रह्म भूमि (उद्धंसोता अकनित्थगामि) में जाकर परिनिब्बान को प्राप्त करता है।

 

अरहत्त मग्ग

अकुसल चित्त 12 में से 5 को नष्ट करता है (दिट्ठीगता विप्पयुत्त चित्त 4 और उद्धच्च चित्त 1)

  1. सोमनस्ससहगतं दिट्ठिगता विप्पयुत्तं असंखारिकं कामावचरा अकुसल लोभमूल चित्तं।
  2. सोमनस्ससहगतं दिट्ठिगता विप्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचरा अकुसल लोभमूल चित्तं।
  3. उपेक्खासहगतं दिट्ठिगता विप्पयुत्तं असंखारिकं कामावचरा अकुसल लोभमूल चित्तं।
  4. उपेक्खासहगतं दिट्ठिगता विप्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचरा अकुसल लोभमूल चित्तं।
  5. उपेक्खासहगतंउध्दच्चसम्पयुत्तंअसंखारिकं कामावचरा अकुसल मोहमूल चित्तं
  • पहाण अकुसल कम्मपथ 10 में से कुछ का पहाण करते - समप्पफलापा, अविज्जा
  • पहाण अकुसल संगह 9 में से कुछ का पहाण करते - भवासव, अविज्जासव, भवोघा, अविज्जोघा, भवयोगा, अविज्जा योगा, अविज्जा कायागन्था, कामउपादान, थीन मिद्धा नीवरणा, उद्धच्च कुक्कुच्च नीवरणा, अविज्जा नीवरणा, भावरागानुसय, मानानुसय, अविज्जानुसय, भवरागा संयोजना, मानसंयोजना, अविज्जा संयोजना, लोभ किलेसा, मोह किलेसा, मान किलेसा, थीन किलेसा, उद्धच्च किलेसा, अहिरिक किलेसा, अनोतप्प किलेसा।
  • पहाण असुकल चेतसिक 14 में से कुछ का पहाण करते – लोभ चेतसिक, मोह चेतसिक, अहिरिक चेतसिक, अनोतप्प चेतसिक, उद्धच्च चेतसिक, मान चेतसिक, थीन चेतसिक, मिद्धा चेतसिक।

 

 

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