जवन चित्त की प्रक्रिया Viewers(1)
- जवन चित्त
च्युति चित्त, पतिसन्धि चित्त और भवंग चित्त तीनों एक ही प्रकार के चित्त और तीनों का योग भी एक समान 19 ही हैं। लेकिन 19 चित्त में से पतिसन्धि के लिए एक चित्त ही अनिवार्य है, मान लीजिए पिछले जन्म में व्यक्ति ने मनुष्य का रूप बनाया तो पतिसन्धि यानि जन्म के समय उपेक्खासहगतं सन्तीरण चित्तं असंखारिकं कामावचर अहेतुक कुसलविपाक चित्त ही कार्य करता है। लेकिन जन्म लेने बाद से मरने तक भवंग चित्त मनुष्य की सुरक्षा करता है। जन्म से लेकर मरने तक जो रूप पाया हैं उसे हम नहीं बदल सकते यानि जानवर है तो मरने तक जानवर ही रहेगें और अगर मनुष्य है तो जन्म से लेकर मरने तक मनुष्य ही रहेगें। अगर हम मनुष्य है तो हम अपना रूप बिल्ली या शेर आदि में परिवर्तित नहीं कर सकते हैं। हमें मनुष्य योनि में जन्म से लेकर मरने तक रहना ही पड़ेगा। भवंग चित्त के साथ कुछ तो है जो हमने पिछले जन्म में किया हैं वो हमारे वर्तमान जीवन में भी आकर हमें रूक कर रखता हैं। अतीत भवंग, भवंग चलन और भवंगुप्पच्छेद को रूक कर रखता है। अब हम आरमण की बात करते हैं कि जब हम जन्म लेते है तब हमारे पास तीन प्रकार के आरमण होते हैं। 1. कम्म आरम्मण (मनो कम्म- अविज्जा, ब्यापाद और मिच्छादिट्ठी) 2.कम्मनिमित्त आरम्मण और 3. गतिनिमित्त आरम्मण (इन तीनों को एक शब्द में कहे तो आरम्मण प्रतिपादक मनसिकार)। आरम्मण प्रतिपादक मनसिकार इसका अर्थ है कि जो भी आरम्मण हम अपने दैनिक जीवन में प्राप्त करते है। वो ये तीन आरम्मण ही हैं। सही मायने में देखा जाये तो मनो कर्म बहुत ही महत्वपूर्ण हैं इसीलिए जो कुछ भी हम इस जीवन में करते है वो सारा हृदयवत्थु (जब हम जन्म लेने के लिए जाते तो काया दसककलाप,भाव दसक कलाप और वत्थु दसक कलाप) में इकट्ठा हो जाता हैं। जन्म लेने से लेकर मरने तक भवंग चित्त हमारी देखभाल करता है।
अतीत भवंग, भवंग चलन और भवंगुप्पच्छेद आरम्मण प्रतिपादक मनसिकार को प्राप्त करके पञ्चद्वारवज्जन के पास भेजता है और पञ्चद्वारवज्जन द्विपञ्चविञ्ञान (कुसल और अकुसल) पाँच प्रकार के आरम्मण को प्राप्त करके सम्पत्तिच्छन के पास भेजता, तब सम्पत्तिच्छन चित्त आरम्मण को ग्रहण करके सन्तीरण के पास भेजता है और सन्तीरण चित्त उस आरम्मण की अच्छी तरह से जाँच-पड़ताल करके वोत्थप्पन को भेजता है, और वोत्थप्पन मनोद्वारवज्जन चित्त में भेज देता हैं। मनोद्वारवज्जन में एक आरमण और बढ जाता जिसे बोलते है धम्मारमण ( धम्मारमण के अन्दर पसाद रूप 5, सुकुमरूप 16, चित्त 121, चेतसिक 52, पञ्ञत्ति और निब्बान है और यह तभी सम्भव है जब हम धम्म का अध्ययन करें) तथा मनोद्वारवज्जन चित्त 6 आरमण जवन चित्त को भेज देता है। और यही वो स्थान है जहाँ रूप को बनाने और बिगाड़ने का कार्य होता हैं। अन्तत वास्तविक रूप का निर्माण करता हैं। -जो हमारा आने वाला जन्म तय करता कि मनुष्य बनेगें या जानवर और जैसे ही रूप का पूरी तरह से निर्माण हो जाता उसके बाद वह हृदयवत्थु के तदालम्बन (बनाये गये रूप को इक्कट्ठा करने का स्थान) में जाकर इकट्ठा हो जाता और वही पर रह कर आने वाले जन्म का इन्तजार करता है।
- पञ्चद्वारवज्जन नाम से तो ऐसा लगता है कि पाँच आरम्मण प्राप्त करता है लेकिन ये सात आरम्मण को प्राप्त करता – 1. रूपारम्मण, 2. सद्धारम्मण, 3. गन्धारम्मण, 4. रसारम्मण, और फोत्थब्बारमण से तीन आरमण प्राप्त करता- 5. पथवी फोत्थब्बारम्मण, 6. तेजो फोत्थब्बारम्मण, 7. वायो फोत्थब्बारम्मण सातों आरम्मण को प्राप्त करके मनोद्वारवज्जन को भेजता और मनोद्वारवज्जन धम्मारम्मण के साथ मनोद्वार विधि चित्त के माध्यम से वर्तमान जीवन के लिए नये रूप का निर्माण करता है।
- पिछला जीवन—8 प्रकार के नरक में हुआ जिसमें 448 उप नरक हैं इसके बाद प्रेत, असुर और तिरच्छान। उदाहरण के लिए हमारा पिछला जन्म कुत्ते का था, लेकिन उस कुत्ते ने धम्म को सुन –सुनकर अपने चित्त को उच्च स्तर तक ले गया और मरने के बाद मनुष्य बन सकता है।
- वर्तमान जीवन—वर्तमान जीवन मनुष्य का है तो इसकी पूरी सम्भावना है कि मनुष्य – नरक, प्रेत, असुर, तिरच्छान, मनुष्य और देव भूमि में जा सकता है। लेकिन ये सब उस व्यक्ति के कर्मों के ऊपर निर्भर करता हैं।
- उदाहरण के लिए (हदयवत्थु) में हमने मनुष्य के रूप का निर्माण किया, यहाँ जानने योग्य बात यह है कि हमने मनुष्य बनने के लिए सुक्का का निर्माण किया है। सुक्का के अन्दर कायदसक कलाप जो हमारे शरीर का निर्माण करता, उसके बाद आता है भावदसक कलाप जो लिंग तय करता है कि पुरूष बनना है या स्त्री। और फिर अन्त में आती है वत्थु 6 जिसके माध्यम से हम चक्खुवत्थु, सोतवत्थु, घानवत्थु, जिव्हावत्थु, कायवत्थु और हदयवत्थु का निर्माण करते हैं।
By Paramattha Dhamma Sikkhaya Foundation
Comments