विचारों की प्रक्रिया Viewers(1)
नोट—हदयवत्थु वह स्थान जहाँ चित्त और चेतसिक रहता हैं। इसीलिए कुछ लोगों का व्यवहार दूसरे व्यक्ति से अलग होता हैं यह सब उनके हदयवत्थु में इक्कट्ठा हो जाता उसी का परिणाम हैं, जो उसने पिछले जन्म से एकत्रित किया है।
इसी तरह से अगर रूप अपाय भूमि का बना है तो पतिसन्धि के समय उपेक्खा सहगतंसन्तीरण चित्त असंखारिकं कामावचर अकुसलविपाक चित्त ही कार्य करेगा। ठीक इसी तरह से अगर रूप देव भूमि का बनाया है तो पतिसन्धि उसी भूमि में होगी।
अभिधम्म के अनुसार जब किसी वस्तु को पाँच द्वारों (आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा (शरीर) इन्द्रियों) के माध्यम में से एक के माध्यम से दिमाग में डाला जाता है तो एक विचार की प्रक्रिया निम्नानुसार चलती है।
विचारों की प्रक्रिया -चित्त, विषय-वस्तुओं को भीतर और बाहर से प्राप्त करता है। जब कोई व्यक्ति गहरी नींद की अवस्था में होता है, तो उसके दिमाग को खाली कहा जाता है या हम दूसरे शब्दों में कहे तो भवंग की स्थिति में होता हैं। जब हमारा दिमाग बाहरी वस्तुओं के सवाल का जवाब नहीं दे पाता है, तो हम हमेशा ऐसी निष्क्रिय स्थिति का अनुभव करते हैं। भवंग का यह प्रवाह हमें तब बाधित करता है जब वस्तुऐं हमारे मन में प्रवेश करती है तब भवंग चित्त में एक विचार क्षण भर के लिए कंपन करता है और चला जाता हैं। उस समय वहाँ इन्द्रियों के द्वार पर पञ्चद्वारावज्जन चित्त उत्पन्न होता और तुरन्त ही समाप्त होता है। इस स्थिति पर उसके नैसर्गिक प्रवाह की जाँच-पड़ताल करता है, और फिर वह चित्त वस्तु की ओर चला जाता है। इसके तुरंत बाद वहाँ चुक्ख विज्ञान उत्पन्न होता और समाप्त हो जाता है। लेकिन अभी तक इसके बारे में हम ज्यादा कुछ नहीं जानता हैं। क्योंकि इस चित्त का भाव संचालन के एक पल के बाद किया जाता हैं। जिसको सम्पत्तिच्छन (जिससे हम वस्तु को देखते है) के नाम से जानते है। इसके बाद आता है जाँच संकाय (जिसको सन्तीरण भी कहते है) या कहे जो वस्तु हमने प्राप्त की उसकी एक क्षणिक परीक्षा आती है। इसके बाद आती है स्थिति प्रतिनिधि अनुभूति से उस चरण को दृढ़ संकल्प या क्षणिक परीक्षा की घबराहट (फोत्थब्बन) कहा जाता है। तथा इस अवस्था में भेदभाव का प्रयोग किया जाता हैं। यहां अपनी मुक्त इच्छा से हिस्सा निभाता है। जवन नामक इस चित्त की अवस्था में सात लगातार विचार वाले क्षण होते हैं जिनमें सभी एक समान प्रकृति के होते हैं। यह इस स्तर पर है कि अच्छा या बुरा किया जाता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह नैतिक या अनैतिक (कुसल या अकुसल) है। तथा कर्म को प्रदर्शित भी करता है। कि इस स्तर पर यदि ठीक से देखा जाए (योनिसो मनसिकार) जवन चित्त नैतिक हो जाता, और अगर गलत तरीके से देखा जाए तो जवन चित्त अनैतिक हो जाता हैं। लेकिन एक अरन्हत के मामले में यह जवन न तो नैतिक और न ही अनौतिक हैं, केवल क्रिया हैं।
1. अतीत भवंग (पूर्व भव का अंग)
2. भवंग चलना (चलायमान भवंग जो वर्तमान समय में हमारी देखरेख करता है)
3. भवंगुपच्छेद (पकड़कर रखना)
4. पञ्चद्वारावज्जन (भाव-चेतना या चित्त का द्वार)
5. पञ्च विञ्ञान (संवेदना-चित्त)
6. सम्पत्तिच्छन (ग्रहण करने वाला चित्त)
7. सन्तीरण (छानबीन या जाँच-पड़ताल करने वाला चित्त)
8. वोत्थपन (निर्धारित करने वाला चित्त)
9. जवन चित्त (प्ररेणा, मनोवेग)
10. जवन चित्त (प्ररेणा, मनोवेग)
11. जवन चित्त (प्ररेणा, मनोवेग)
12. जवन चित्त (प्ररेणा, मनोवेग)
13. जवन चित्त (प्ररेणा, मनोवेग)
14. जवन चित्त (प्ररेणा, मनोवेग)
15. जवन चित्त (प्ररेणा, मनोवेग)
16.तदालम्बन (लिपिबद्ध करना)
17. तदालम्बन (लिपिबद्ध करना)
मेरे साथ जो घटना हुई बाइक वाले ने पीछे से टक्कर मारी ,वह काया का दुख ही बहुतायत में हुआ ,
उसका कारण देखा अभिधम्म में तो ज्ञात हुआ कि मेरे भीतर काया में वह संखार थे और वे उस बाइक वाले के काया के संखार से बिल्कुल मेल खा गए तो वह फल दोनों को मिला ,अक्समात यह हुआ ।
By Paramattha Dhamma Sikkhaya Foundation
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