चंक्कमनचित्त 19

चंक्कमनचित्त 19

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सिद्धार्थ के बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद, उनके स्वरूप में कोई बदलाव नहीं हुआ। इसलिए देवता भी चिन्तित थे। कि क्या वे बुद्ध हैं या नहीं। इस प्रकार बुद्ध ने हवा में 19 कदम चलकर देवताओं को यह सिद्ध किया,कि उन्होने सभी 31भूमियों से अपने पुनर्भव का पूरी तरह उन्मूलन (नष्ट) कर दिया। यहां बुद्ध का पुनर्भव नहीं होगा।

पहला कदम रखा तो उन्होने अपाया (नरक, प्रेत, असुर और तिरच्छान) भूमि से पुनर्भवों का पूरी तरह उन्मूलन (नष्ट) कर दिया।

दूसरा कदम रखा तो उन्होने मनुष्य और चातुमहाराजिका देव भूमि से पुनर्भवों का उन्मूलन (नष्ट)  किया।

तीसरे से लेकर दसवें कदम को रखकर उन्होने देवभमि 5 से पुनर्भवों का उन्मूलन (नष्ट)  किया।

ग्यारहवें से लेकर पन्द्रहवें कदम को रखकर उन्होने रूपब्रह्म भूमि 16 से पुनर्भवों का उन्मूलन (नष्ट) किया।

सोलहवें से लेकर उन्नीसवें कदम को रखकर उन्होने अरूप ब्रह्मभूमि 4 से पुनर्भवों का उन्मूलन (नष्ट) किया।

  1. उपेक्खासहगतं सन्तीरणचित्तं असंखारिकं कामावचर अकुसलविपाक चित्तं।
  2. उपेक्खासहगतं सन्तीरणचित्तं असंखारिकं कामावचर अहेतुकाकुसलविपाक चित्तं।
  3. सोमनस्ससहगतं ञाणसम्पयुत्तंअसंखारिकं कामावचर महाविपाक चित्तं।
  4. सोमनस्ससहगतं ञाणसम्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचर महाविपाक चित्तं।
  5. सोमनस्ससहगतं ञाणविप्पयुत्तं असंखारिकं कामावचर महाविपाक चित्तं।
  6. सोमनस्ससहगतं ञाणविप्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचर महाविपाक चित्तं।
  7. उपेक्खासहगतं ञाणसम्पयुत्तंअसंखारिकं कामावचर महाविपाक चित्तं।
  8. उपेक्खासहगतं ञाणसम्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचर महाविपाक चित्तं।
  9. उपेक्खासहगतं ञाणविप्पयुत्तं असंखारिकं कामावचर महाविपाक चित्तं।
  10. उपेक्खासहगतं ञाणविप्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचर महाविपाक चित्तं।
  11. वितक्क विचार पीति सुख एकग्गता सहितं ससंखारिकं पठमज्झान रूपावचर महाविपाक चित्तं।
  12. विचार पीति सुख एकग्गता सहितं ससंखारिकं दुतियज्झान रूपावचर महाविपाक चित्तं।
  13. पीति सुखा एकग्गता सहितं ससंखारिकं ततियज्झान रूपावचर महाविपाक चित्तं।
  14. सुख एकग्गता सहितं ससंखारिकं चतुत्थज्झान रूपावचरा महाविपाक चित्तं।
  15. उपेक्खा एकग्गता सहितं ससंखारिकं पञ्चमज्झान रूपावचर महाविपाक चित्तं।
  16. उपेक्खा एकग्गता सहितं ससंखारिकं आकासानञ्‍चायतन अरूपावचर महाविपाक चित्तं।
  17. उपेक्खा एकग्गता  सहितं ससंखारिकं विञ्‍ञाणञ्यायतनं अरूपावचर महाविपाक चित्तं।
  18. उपेक्खा एकग्गता सहितं ससंखारिकं आकिञ्चञ्‍ञायतन अरूपावचर महाविपाक चित्तं।
  19. उपेक्खा एकग्गता सहितं ससंखारिकं नेवसञ्‍ञानासञ्‍ञायतन अरूपावचर महाविपाक चित्तं।

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