सेनासन

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सेनासन

 (आसन बिछाने से पहले संगायन करें)

यथापच्चयं पवत्तमाणं धातुमत्तमेनेतं यदिदं सेनासणं तदुपभुञ्जको च पुग्गलो धातुमत्तको निस्सत्तो निज्जीवो सुञ्ञो, सब्बानि पन इमानि सेनासणं अजिगुच्छनियानी इमानि पूतिकायं पत्वा अतिविय जिगूच्छनीयानि जायन्ति।

( आसन प्रत्यय के रूप में सोवित होने पर भी वह धातु मात्र ही है और उसको धारण करने वले व्यक्ति भी धातु मात्र सत्य रहित निर्जीव और शन्यू है। ये सारे आसन अजिगुप्सनीय है किंतु इस गन्दे शरीर से लग कर अत्यन्त जिगुप्सनीय हो जाते हैं)

 

 (आसन बिछाते समय संगायन करें)

पटिसंखा योनिसो सेनासणं पटिसेवमि, यावदेव सीतस्स पटिघाताय उण्हस्स पटिघाताय डंसमकस वता तपसिरिं सपसम्पफस्साणं पटिघाताय, यावदेव हिरिकोपिन पटिच्छादनात्थं।

(मैं ठीक से जानकर आसन को बिछाती करती हूँ, जो कि सर्दी, गर्मी की पींडा और डंस, मच्छर, हव, धूप, साँप, बिच्छू के आघात को रोकने के लिए हैं, तथा लज्जा अंग (शरीर) को ढाकने के लिए हैं)

 (आसन बिछा लेने के बाद संगायन करें)

अज्जमया अपच्चवेक्खित्वा यं सेनासणं परिभुत्तं तं यावदेव सीतस्स उण्हस्स पटिघाताय डंसमकस वता तपसिरिं सपसम्पफस्साणं पटिघाताय, यावदेव हिरिकोपिन पटिच्छादनात्थं।(आज मैंने प्रत्यवेक्षण किए बिना जिस आसन को धारण किया वह केवल सर्दी, गर्मी से बचाव के लिए तथा डंस, मच्छर, हव, धूप, साँप, बिच्छू के स्पर्श से बचने के लिए और ऋतुओं के विघ्न को दूर करने तथा एकान्त चिन्तन के लिए है।)

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