चीवर पच्चवेक्खण Viewers(1)
पच्चवेक्खण
चीवर के लिए (चीवर पहनने से पहले संगायन करें)
यथापच्चयं पवत्तमाणं धातुमत्तमेनेतं यदिदं उत्तरासंगं चीवर, अन्तरवसकं चीवरं, संघच्छिकं चीवर, उदकसातिका चीवर, एककायबन्धणं, दवीकायबन्धन तदुपभुञ्जको च पुग्गलो धातुमत्तको निस्सत्तो निज्जीवो सुञ्ञो, सब्बानि पन इमानि उत्तरासंगं चीवर, अन्तरवसकं चीवरं, संघच्छिकं चीवर, उदकसातिका चीवर, एककायबन्धणं, दवीकायबन्धन अजिगुच्छनियानी इमानि पूतिकायं पत्वा अतिविय जिगूच्छनीयानि जायन्ति।
( चीवर प्रत्यय के रूप में सोवित होने पर भी वह धातु मात्र ही है और उसको धारण करने वले व्यक्ति भी धातु मात्र सत्य रहित निर्जीव और शन्यू है। ये सारे चीवर अजिगुप्सनीय है किंतु इस गन्दे शरीर से लग कर अत्यन्त जिगुप्सनीय हो जाते हैं)
(चीवर पहनते समय संगायन करें)
पटिसंखा योनिसो उत्तरासंगं चीवर, अन्तरवसकं चीवरं, संघच्छिकं चीवर, उदकसातिका चीवर, एककायबन्धणं, दवीकायबन्धन पटिसेवमि, यावदेव सीतस्स पटिघाताय उण्हस्स पटिघाताय डंसमकस वता तपसिरिं सपसम्पफस्साणं पटिघाताय, यावदेव हिरिकोपिन पटिच्छादनात्थं।
(मैं ठीक से जानकर चीवर को धारण करती हूँ, जो कि सर्दी, गर्मी की पींडा और डंस, मच्छर, हव, धूप, साँप, बिच्छू के आघात को रोकने के लिए हैं, तथा लज्जा अंग (शरीर) को ढाकने के लिए हैं।)
(चीवर पहन लेने के बाद संगायन करें)
अज्जमया अपच्चवेक्खित्वा यं उत्तरासंगं चीवर, अन्तरवसकं चीवरं, संघच्छिकं चीवर, उदकसातिका चीवर, एककायबन्धणं, दवीकायबन्धन परिभुत्तं तं यावदेव सीतस्स उण्हस्स पटिघाताय डंसमकस वता तपासिरिं सपसम्पफस्साणं पटिघाताय, यावदेव हिरिकोपिन पटिच्छादनात्थं।
(आज मैंने प्रत्यवेक्षण किए बिना जिस चीवर को धारण किया वह केवल सर्दी, गर्मी से बचाव के लिए तथा डंस, मच्छर, हव, धूप, साँप, बिच्छू के स्पर्श से बचने के लिए और ऋतुओं के विघ्न को दूर करने तथा एकान्त चिन्तन के लिए है।)
By Paramattha Dhamma Sikkhaya Foundation
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