पहाण मोह चेतसिक Viewers(1)
पहाण मोह चेतसिक (अभिधम्मपिटक – धम्मसंगिनि निक्खेपकण्ड 1106, 12)
हम अभिवादन करते है मोह चेतसिक को नष्ट करने के लिए
मोह चेतसिक वो कर्म बनाते हैं, जो अपाय भूमि 4 (नरक, प्रेत, असुर और तिरच्छान) की ओर लेकर जाता है।
जिसके द्वारा मोह चेतसिक - लोभमूल चित्त 8, दोसमूल चित्त 2, मोहमूल चित्त 2 के साथ कार्य करता है। जो हमें यहां से 12 प्रकार के मोह की ओर लेकर जाता है।
यह इस प्रकार आते है-
दुक्खे अञ्ञाणं – दुख को न जानना 160 (लोकिय चित्त 81+ चेतसिक 51+ रूप 28)
दुक्खसमुदये अञ्ञाणं – 160 प्रकार के दुख के कारणों को न जानना (लोभ चेतसिक)
दुक्खनिरोधे अञ्ञाणं – निब्बान
दुक्खनिरोधगामिनी पटिपद अञ्ञाणं- दुख निवारण के मार्ग को न जानना (आर्यअष्टांगिक मार्ग)
पुब्बन्ते अञ्ञाणं – भूतकाल को लेकर अज्ञान
अपरन्ते अञ्ञाणं – भविष्य को लेकर अज्ञान
पुब्बन्तापरन्ते अञ्ञाणं– भूतकाल व भविष्य और दोनों को लेकर अज्ञान
इदपच्चयता पटिच्चसमुप्पन्नेसु धम्मेसु अञ्ञाणं– कारण और परिणाम को लेकर अज्ञान
बुद्ध जीवितं याव निब्बाणं सरणं गच्छामि (महाअभिवादन)
1.बहुस्सुत्तता–धम्म को ज्यादा से ज्यादा सुनना
2. परिपुच्छकता– बुद्धवचनों का अध्ययन करके अपनी शंकाओं को दूर करना, हमें धम्म में
खुद के विचारों को नहीं जोड़ना चाहिए।
3. विनये पक्कतञ्युता- विनय या सीलों में पक्का कड़ाई से पालन करना
4. बुद्धसेविता- बुद्ध की शिक्षाओं का पालन करना।
5. कल्याणमित्तता– सच्चे मित्र बनाना जो अपने मित्र को हमेशा धम्म के मार्ग की अग्रसर करते रहें।
6. सप्पायकथा– (उपयुक्त स्थान पर निवास करना) लोकुत्तर चित्त या परमशान्ति की अनुभूति हो जाना– निब्बान
धम्मं जीवितं याव निब्बाणं सरणं गच्छामि (महाअभिवादन)
1.बहुस्सुत्तता–धम्म को ज्यादा से ज्यादा सुनना
2. परिपुच्छकता– बुद्धवचनों का अध्ययन करके अपनी शंकाओं को दूर करना, हमें धम्म में
खुद के विचारों को नहीं जोड़ना चाहिए।
3. विनये पक्कतञ्युता-- विनय या सीलों में पक्का कड़ाई से पालन करना
4. बुद्धसेविता- बुद्ध की शिक्षाओं का पालन करना।
5. कल्याणमित्तता– सच्चे मित्र बनाना जो अपने मित्र को हमेशा धम्म के मार्ग की अग्रसर करते रहें।
6. सप्पायकथा– (उपयुक्त स्थान पर निवस करना) लोकुत्तर चित्त या परमशान्ति की अनुभूति हो जाना– निब्बान
संघं जीवितं याव निब्बाणं सरणं गच्छामि (अभिवाद)
1.बहुस्सुत्तता–धम्म को ज्यादा से ज्यादा सुनना
2. परिपुच्छकता– बुद्धवचनों का अध्ययन करके अपनी शंकाओं को दूर करना, हमें धम्म में
खुद के विचारों को नहीं जोड़ना चाहिए।
3. विनये पक्कतञ्युता- विनय या सीलों में पक्का रहना चाहिए
4. बुद्धसेविता- बुद्ध की शिक्षाओं का पालन करना।
5. कल्याणमित्तता– सच्चे मित्र बनाना जो अपने मित्र को हमेशा धम्म के मार्ग की अग्रसर करते रहें।
6. सप्पायकथा– (उपयुक्त स्थान पर निवस करना) लोकुत्तर चित्त या परमशान्ति की अनुभूति हो जाना– निब्बान
निब्बाणं परमं सुखं (अभिवाद)
निब्बाणं परमं सुखं (अभिवाद)
निब्बाणं परमं सुखं (अभिवाद)
By Paramattha Dhamma Sikkhaya Foundation
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