मृत पूर्वजों (स्वर्गवासियों) के लिए सर्वोच्च उपहार

मृत पूर्वजों (स्वर्गवासियों) के लिए सर्वोच्च उपहार

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मृत पूर्वजों (स्वर्गवासियों) के लिए सर्वोच्च उपहार

 बुद्ध कहते हैं कि सबसे बड़ा उपहार अपने मृत पूर्वजों को प्रदान कर सकते वो है ' कुसल कर्म करना उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग दान देते, उनके कर्मों का फल उनके पूर्वजों को भी प्राप्त होता हैं। बुद्ध कहते कि जो लोग ऐसे पवित्र पुरुषों को दान देकर,वे अपने गुणों को मृत पूर्वजों को अच्छे कर्मों के रूप में प्राप्त कर स्थानान्तरित व प्रोत्साहित करते हैं। जो लोग एक दुर्भाग्यपूर्ण चेतना के रूप में पुनर्जन्म ले रहे हैं। दोस्तों और रिश्तेदारों को जो कुछ पुण्य कर्म करने से उन्हें अपने पुण्यों के माध्यम से उनकी पीड़ा या हालत को कुछ हद तक ठीक किया जा सकता है। पुण्य कर्म करके, वे उनकी भलाई के लिए अपने प्रिय लोगों के लिए उनके गुणों के आधार उन्हे याद करते हैं। याद करके वे उन्हें वास्तविक सम्मान देते है, और  दिवंगत व्यक्तियों के नामों को बनाए रखने का यही सबसे अच्छा तरीका है। खुशी के साथ अपने राज्य या घर में (दिवंगत व्यक्ति) रहने वाले रिश्तेदारों पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। अत: यह, रिश्तेदारों की पुण्य कर्मों के आधार पर दिवंगत व्यक्तियों को उन्हें सीधे प्रेम-दया द्वारा याद करने का कर्तव्य है ।

खड़े रहते दीवार के उस पार, या फिर चौराहे पर।

खड़े रहते हैं दरवाजों के पास, अपने पुराने घर में वापस आने के लिए।

जब परोसा जाता हैं खान-पान (भोजन) कोई उन्हे याद नहीं करता हैं, 

क्योंकि उनके ऐसे ही कर्म होगें।

जिन सगे-सम्बन्धियों को उन पर दया आती हैं, वे शुभ समय

पर भोजन, पेय और कपड़ों का दान करते हैं।

ये हमारे गुजरे हुए सम्बन्धी, सुखी हों। और जो वहाँ आते हैं,

सम्बन्धी-प्रेत इक्कठ्टे होते हैं।

हमारे द्वारा दिये हुए बहुत से खान-पान के लिए वो आशीष देते हैं।

हमारे सम्बन्धी खूब जियें जिनसे हमें ये भोजन प्राप्त हुआ हैं।

हमारी बहुत इज्जत की,  देने वाला कभी निष्फल नहीं रहता हैं।

क्योंकि प्रेतों के पास न खेत होते हैं, न ही पशुपालन, न ही

व्यापार होता हैं, और न पैसा होता हैं। दिया हुआ उन्हे मिलता हैं।

यहाँ जो कुछ करना था वो कर चुके- जैसे पहाड़ से वर्षा का जल

नीचे बहता हैं, इसी तरह यहाँ दिया हुआ प्रेतो को मिलता हैं।

जैसे- नदियां सागर भर देती हैं। वैसे ही यहाँ दिया हुआ प्रेतों को मिल जाता हैं।

पूर्व कर्मों को याद करते हुए प्रेतों के लिए दक्षिणा देनी चाहिए।

न रोना, न शोक करना, और न ही परिवेदना। इस प्रकार से प्रेतो को लाभ होता हैं।

जब सम्बन्धी ऐसा करते हैं, तब इस प्रकार की दक्षिणा जब संघ में सुप्रतिष्ठित की जाती हैं।

जो लम्बे समय तक हित के लिए और तत्काल लाभ के लिए होती हैं।

इस प्रकार से जाति धर्म दिखाया जाता हैं। और प्रेतों को सम्मान दिया जाता हैं।

भिक्खु, भिक्खुनिओं को बल दिया जाता हैं। और तुम्हारे मृत पूर्वजों को

बहुत पुण्य मिलता हैं।

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