सिद्धार्थ से बुद्ध बनने तक की यात्रा

सिद्धार्थ से बुद्ध बनने तक की यात्रा

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सिद्धार्थ से बुद्ध बनने तक की यात्रा

   यो वो, आनन्द, मया धम्मो च विनयो च देसितो पञ्‍ञत्तो, सो वो ममच्‍चयेन सत्था।   

   (आनन्द – मैंने जो धम्म एवं विनय का उपदेश दिया हैं, वही मेरे बाद तुम्हारा शास्ता (गुरू) होगा)

 

वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, सामान्य तौर पर वैशाख पूर्णिमा के दिन को त्रिविधि पूर्णिमा के नाम से जाना जाता हैं । लेकिन वैशाख पूर्णिमा के दिन एक और घटना घटी थी, वह थी बुद्ध के द्वारा छठवें चन्द्र मास की पूर्णिमा को कपिलवस्तु में वेस्सन्तर जातक का पाठ करना या दूसरे शब्दों कहे कि अपने परिवार जनों को अपने पिछले जन्म के बारें में बताना। ज्यादातर लोग वेस्सन्तर जातक कि बात नहीं करते क्योंकि लोग सोचते हैं कि ये उनका पिछला जन्म था। इसलिए लोग इस बात को ज्यादा प्राथमिकता नहीं देते है। लेकिन त्रिपिटक के सुत्तपिटक के खुद्दकनिकाय के अन्तर्गत इसका जिक्र किया हैं। इसलिए ये वैसाख पूर्णिमा चतुर्विधि पूर्णिमा हैं। जन्म, बोधिज्ञान, वेस्सन्तर जातक को सुनाना और महापरिनिर्माण। बोधिसत्व सिद्धार्थ का जन्म 563 ई. में वैसाख पूर्णिमा लुम्बिनि में हुआ। इनके पिता शुद्धोधन थे, जोकि शाक्य कुल के क्षत्रिय थे, और कपिलवस्तु के राजा थे। कपिलवस्तु नेपाल की तराई क्षेत्र में स्थित छोटा राज्य था। माता का नाम महामाया था। जन्म के सातवें दिन ही माता का देहांत हो गया। अत: पालन-पोषण इनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया। सिद्धार्थ का विवाह 16 वर्ष की अवस्था में यशोधरा के साथ हुआ, जोकि कोलिय कुल की कन्या थीं। यशोधरा से राहुल नाम का पुत्र भी उत्पन्न हुआ। सांसारिक समस्याओं से व्यथित होकर सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर दिया। इस त्याग को बौद्ध धर्म में महाभिनिष्क्रमण के नाम से जाना जाता है। गृहत्याग के उपरांत सिद्धार्थ सर्वप्रथम अनोमा नदी के तट पर ही पहुंचे थे। यहां पर उन्होंने अपने सिर को मुंडवाकर भिक्षुओं वाले काषाय वस्त्र धारण किए। ज्ञान की खोज में सिद्धार्थ सबसे पहले वैशाली के अलार कलाम नामक संन्यासी के पास पहुंचे, जिन्होंने इन्हें सांख्य दर्शन की शिक्षा दी। अलारकलाम के आश्रम के बाद सिद्धार्थ ने उरुवेला (बोधगया) के लिए ही प्रस्थान किया था, जहां इनकी कौडिन्य आदि पांच संन्यासियों से भेंट हुई। वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ वटवृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे। समीपवर्ती गाँव की एक स्त्री सुजाता को पुत्र हुआ। उसने बेटे के लिए एक वटवृक्ष की मनौती मानी थी। वह मनौती पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुँची। सिद्धार्थ वहाँ बैठे ध्यान कर रहे थे। उसे लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं। सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा- ‘जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो।’उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उन्हे सत्य का बोध हुआ। तभी से सिद्धार्थ 'बुद्ध' कहलाए। आज मैं, आप लोगों  को बोधिज्ञान त्रिपिटक के कुछ अंश की जानकारी साझा कर रही हूँ। बोधिकथा पटिच्चसमुप्पाद यह विनय पिटक के महावग्ग का अंग जो सिद्धार्थ के बुद्धत्व प्राप्ति पर आधारित हैं। बुद्ध ने पटिच्चसमुप्पाद को नष्ट कर दिया जिसके कारण जीवित प्राणि अस्तित्व की पुनरावृत्ति करते रहते हैं या कहे कि भव चक्र में घूमते रहते हैं। बोधि कथा को तीन भागों में बाटां गया हैं, पहला पहर शाम 6 बजे से शाम 10 बजे तक, दूसरा पहर शाम 10 बजे से सुबह 2 बजे तक और तीसरा पहर सुबह 2 बजे से सुबह 6 बजे तक का है। पहले पहर को पुब्बेनिवासनुसति ञ्ञान (पूर्वजन्मों का स्मरण होना)- त्रिपिटक में कहा गया है कि- जिसके माध्यम से सिद्धार्थ ने बुद्ध बनने से पहले अपने असंख्य या अनगिनत पिछले जन्मों को स्पष्ट रूप से देखा। दूसरे पहर को च्युति-उप्पातञ्ञान (नष्ट होने एवं पैदा होने का ज्ञान) त्रिपिटक में कहा गया है कि- जिसके माध्यम से सिद्धार्थ ने बुद्ध बनने से पहले  कर्म और कर्म के परिणाम को जाना जो व्यक्ति को 31 भूमि में से किसी एक में जन्म लेने के लिए बाध्य करता है। तीसरे पहर को आसवक्खिय ञ्ञान (विकारों के क्षय का ज्ञान) त्रिपिटक में कहा गया है कि- जिसके माध्यम से  बुद्ध ने यह जान लिया कि कौन-सा धर्म उचित हैं व्यक्ति को सुनाने के लिए जिससे वो ज्ञान प्राप्त कर सके। सिद्धार्थ के बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद, उनके स्वरूप में कोई  बदलाव नहीं हुआ। इसलिए देवता  चिन्तित थे। कि क्या वे बुद्ध हैं या नहीं। इस प्रकार बुद्ध  ने हवा में 19 कदम चलकर देवताओं को यह  सिद्ध किया कि उन्होने सभी 31 भूमियों का पूरी तरह उन्मूलन (नष्ट) कर दिया। यहां बुद्ध का पुनर्जन्म नहीं होगा।

पहला कदम रखा तो उन्होने अपाया (नरक, प्रेत, असुर और तिरच्छान) भूमि से पुनर्जन्म का पूरी तरह उन्मूलन (नष्ट) कर दिया।

दूसरा कदम रखा तो उन्होने मनुष्य और चातुमहाराजिका देव भूमि से पुनर्जन्मों का उन्मूलन (नष्ट)  किया।

तीसरा से लेकर दसवें कदम को रखकर उन्होने देव भमि 5 से पुनर्जन्मों का उन्मूलन (नष्ट)  किया।

ग्यारह से लेकर पन्द्रहवें कदम को रखकर उन्होने रूप ब्रह्मा भूमि 16 से पुनर्जन्मों का उन्मूलन (नष्ट) किया।

सोलह से लेकर उन्नीसवें कदम को रखकर उन्होने अरूप ब्रह्मा भूमि 4 से पुनर्जन्मों का उन्मूलन (नष्ट) किया। इन चारों घटनाओं  के उत्पन्न होने की वजह से वैशाख पूर्णिमा को चतुर्विधि पूर्णिमा के नाम से जाना जाता हैं लेकिन इन चारों बातों से ज्यादा लोग परिचित नहीं हैं। इसलिए यह मेरा छोटा सा प्रयास है कि आप तक सही और वास्तविक धम्म पहुँचे।

 

साधुवाद हमारा और आपका सभी का मंगल हो

साधू साधू साधू नवुतिउपानिधिबन्ध अनुमोदामि।

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