तिरोकुट्टसुत्तं Viewers(1)
(सुत्तपिटक-खुद्दकनिकाय, खुद्दकपाठपालि, 7. तिरोकुट्टसुत्तं) के सुत्त भगवान बुद्ध ने कहा कि सबसे बड़ा उपहार यह हैं, कि अपने मृतक पूर्वजों को अपने कुसल कर्मों का पुण्य देना। तथागत बुद्ध ने कहा कि जो लोग धर्म के मार्ग पर आरूढ़ व्यक्ति को दान देते हैं, उनके कर्मों का फल उनके पूर्वजों को भी प्राप्त होता हैं।बुद्ध ने कहा कि जो लोग ऐसे पवित्र लोगों को दान देते है, वे अपने गुणों और पुण्यों को अपने पूर्वजों के अकुसल कर्मों को कुसल कर्मों के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं। और उन्हें प्रोत्साहित भी कर सकते हैं। जो लोग एक दुर्भाग्यपूर्ण चेतना के रूप में पुनर्जन्म ले रहे हैं। उनके दोस्त और रिश्तेदार कुछ कुसल कर्म करके अपने पुण्य कृत्यों के माध्यम से उनकी पीड़ा या हालत को परिवर्तित कर सकते है। कुसल कर्म करके, वे उनकी भलाई के लिए, अपने प्रिय लोगों के लिए, अपने पुण्य कर्मों के आधार पर उनकी स्थिति को परिवर्तित कर सकते हैं। उन्हें याद करके,वे उन्हें वास्तविक सम्मान देते हैं, और पूर्वजों के नामों को बनाए रखने के लिए सम्यक प्रयास करते हैं। अत: यह अपने रिश्तेदारों के कर्मों के पुण्यों के आधार पर भी पूर्वजों को उनकी प्रेम-दया और करूणा द्वारा याद करने का कर्तव्य बनता हैं।
तिरोकुट्टेसु तिट्ठन्ति, सन्धिसिङ्घाटकेसुच।
द्वारबाहासुतिट्ठन्ति, आगन्त्वानसकंघरं॥
पहूतेअन्नपानम्हि, खज्जभोज्जेउपट्ठिते।
न तेसंकोचिसरति, सत्ताणंकम्मपच्चया॥
एवंददन्तिञातीणं, येहोन्तिअनुकम्पका।
सुचिंपणीतंकालेन, कप्पियंपानभोजणं।
इदंवोञातीणंहोतु, सुखिताहोन्तुञातयो॥
तेचतत्थसमागन्त्वा, ञातिपेतासमागता।
पहूतेअन्नपानम्हि, सक्कच्चं अनुमोदरे॥
चिरंजीवन्तुनोञाती, येसंहेतुलभामसे।
अम्हाकञ्चकतापूजा, दायकाचअनिप्फला॥
नहितत्थकसि अत्थि, गोरक्खेत्थनविज्जति।
वणिज्जातादिसीनत्थि, हिरञ्ञेनकयाकयं।
इतोदिन्नेनयापेन्ति, पेताकालकता तहिं॥
उन्नमेउदकंवुट्ठं, यथानिन्नंपवत्तति।
एवमेवइतोदिन्नं, पेताणंउपकप्पति॥
यथावरिवहापूरा, परिपूरेन्तिसागरं।
एवमेवइतोदिन्नं, पेताणंउपकप्पति॥
अदासि मेअकासिमे, ञातिमित्ता सखाचमे।
पेताणंदक्खिणंदज्जा, पुब्बेकतमनुस्सरं॥
नहिरुण्णंवसोकोव, याचञ्ञा परिदेवना।
नतंपेतानमत्थाय, एवंतिट्ठन्तिञातयो॥
अयञ्चखोदक्खिणादिन्ना, सङ्घम्हिसुप्पतिट्ठिता।
दीघरत्तं हितायस्स, ठानसोउपकप्पति॥
सोञातिधम्मोचअयंनिदस्सितो, पेतानपूजाचकताउळारा।
बलञ्चभिक्खूनमनुप्पदिन्नं, तुम्हेहिपुञ्ञं पसुतंअनप्पकन्ति॥
तिरोकुट्ट पेतवत्थु पञ्चमं निट्ठितं।
साधु साधु साधु नवुति उपा निधि बन्ध अनुमोदामि।
By Paramattha Dhamma Sikkhaya Foundation
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