महापथवीसक्खिअहोसि

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  • अट्ठकथा सुत्तपिटक मज्झिमनिकाय मूलपण्णास ओपम्मवग्गो, निवापसुत्तवण्णना 47)

 

बोधिसत्व सिद्धार्थ ने पूर्णिमा के दिन पहली महान विजय देवपुत्त मार के ऊपर प्राप्त की। बोधिसत्व अदृश्य मुद्रा में सिंहासन पर विराजमान हुए और संकल्प किया। चाहे मेरे शरीर का मांस और रक्त सूख जाये,चाहे केवल मेरी त्वचा, नसें और हड्डियाँ ही रह जाए फिर भी मैं इस मुद्रा से हटूगाँ नहीं। उस समय देवपुत्त मार को यह ज्ञात हुआ कि बोधिसत्व सिद्धार्थ बुद्धत्व को प्राप्त होगें। मारने बोधिसत्व को मारने के लिए विभिन्न प्रकार के यन्त्रों का प्रयोग किया। वह खुद अपने गिरिमेखला नामक हाथी, पर सावर हो और विभिन्न हथियार पकड़े हुए, बोधिसत्व से चिल्लाया: "अरे, सिद्धार्थ, तुम इस सिंहासन से उतर जाओ। ये सिंहासन मेरा है, तुम्हारा नहीं! " बोधिसत्व खुद के लिए इस तरह सोच रहे थे, कि  "मार और उसके कई सैनिक मुझ पर हमला करने के लिए आ रहे हैं। न तो मेरे माता-पिता, नही रिश्तेदार और नही मेरे सगे सम्बन्धी मेरे साथ हैं। मुझे अपनी दस पारमिताओं पर भरोसा करना होगा जिसका मैं एक लंबे समय से पालन कर रहा हुँ। मैं मार से इन दस पारमिताओं "की शक्ति से अपनी रक्षा करूगाँ।बोधिसत्व, ने जबाव में कहा: "मार, आपने न तो दस पारमिताओं को पूरा किया है, और न ही आपने तीन बल आचरण का प्रयोग किया है, और न ही आपने पाँच महान बलिदान का प्रदर्शन किया है। मैं ही केवल एक  हूँ जिसने इन सभी को पूरा किया है। इसलिए यह अजेय सिंहासन मेरे लिए है। आपके लिए नहीं "बोधिसत्व ने कहा: "यह सिंहासन आपकी दान की योग्यता के कारण उत्पन्न नहीं हुआ था। यहाँ आपका कोई गवाह नहीं हैं, जो यह सिद्ध कर सके कि यह सिंहासनआपकी दान की योग्यता के कारण उत्पन्न हुआ हैं। मार ने अपने सैनिकों से कहा कि उसके लिए गवाही दें। बोधिसत्व ने अपना दाहिना हाथ महान पृथ्वी पर रखते हुए इस प्रकार कहा: "यह सिंहासन मेरे पारमिताओं के परिणाम के रूप में उत्पन्न हुआ। अकेले चलकर अतीत के जीवन अस्तित्व में विभिन्न पारमिताओं के रूप में यहां तक कि मेरे ​​सातवें जन्म में वेस्सन्तरा के रूप में, मैंने  महान पारमितायें संचित कर, सात बार डरावने दृश्यों से इस महान पृथ्वी का कारण बना हूँ। इसलिए यह महान पृथ्वी मेरी साक्षी है।" उस समय पर महान पृथ्वी, बोधिसत्व की पारमिताओं के आदेश अनुसार उनकी साक्षी बनी, हिंसक कांप रहे थे। मार और उसके अनुयायियों ने जोर की गड़गड़ाहट ध्वनियों प्रकट होने के कारण भयभीत होकर भाग गए। इसके बाद बोधिसत्त ने देवपुत्त मार और उसकी सेना को पराजित कर दिया। ब्रह्मा ने ऊँचे स्वर में कहा देवपुत्त मार बोधिसत्व द्वारा पराजित किया गया। इस प्रकार बोधिसत्त ने अजेय "जीत प्राप्त की। ब्रह्मा और देव ने बड़ी खुशी से बोधिसत्व को सुगंधित पुष्प और इत्र समर्पित किये। और बड़ी प्रसन्नता के साथ उनकी जीत का उत्सव मनाया।

 

तङ्खणञ्‍ञेव मारो बाहुसहस्सं मापेत्वा दियड्ढयोजनसतिकं गिरिमेखलं नाम हत्थिं आरुय्ह नवयोजनं मारबलं गहेत्वा अद्धक्खिकेन ओलोकयमानो पब्बतो विय अज्झोत्थरन्तो उपसङ्कमि। महासत्तो, ‘‘मय्हं दस पारमियो पूरेन्तस्स अञ्‍ञो समणो वा ब्राह्मणो वा देवो वा मारो वा ब्रह्मा वा सक्खि नत्थि, वेस्सन्तरत्तभावे पन मय्हं सत्तसु वारेसु महापथवी सक्खि अहोसि; इदानिपि मे अयमेव अचेतना कट्ठकलिङ्गरूपमा महापथवी सक्खी’’ति हत्थं पसारेति। महापथवी तावदेव अयदण्डेन पहतं कंसथालं विय रवसतं रवसहस्सं मुञ्‍चमाना विरवित्वा परिवत्तमाना मारबलं चक्‍कवाळमुखवट्टियं मुञ्‍चनमकासि। महासत्तो सूरिये धरमानेयेव मारबलं विधमित्वा पठमयामे पुब्बेनिवासञाणं, मज्झिमयामे दिब्बचक्खुं विसोधेत्वा पच्छिमयामे पटिच्‍चसमुप्पादे ञाणं ओतारेत्वा वट्टविवट्टं सम्मसित्वा अरुणोदये बुद्धो हुत्वा , ‘‘मया अनेककप्पकोटिसतसहस्सं अद्धानं इमस्स पल्‍लङ्कस्स अत्थाय वायामो कतो’’ति सत्ताहं एकपल्‍लङ्केन निसीदि।

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